कर्मयुद्ध

इतिहास गवाह है कि अगर महाभारत के युद्ध में कृष्ण पांडवों का साथ न देते तो अकेला कर्ण ही पूरी सेना पर भारी पड़ता, लेकिन मैनेजमेंट के इस गुरु ने ऐसा युद्ध मैदान में बिना शस्त्र उठाए ऐसा खेल दिखाया कि कौरवों की अपार सेना के साथ महावीर और विश्वविजयी कर्ण भी हार गए। पांचों भाइयों के साथ खड़ा ये ग्वाला अपनी वैराग्यता और चातुर्यता से पूरे युद्ध की वल्गाएं खींच रहा था, यह शस्त्र तो उठा नहीं रहा था, लेकिन सारथी बना बैठा पार्थ के रथ की वल्गाएं नहीं थामे था, बल्कि पूरे युद्ध की वल्गाएं इसके हाथ में थी। यह जिस तरह चाह रहा था, वैसा ही तो उस युद्ध भूमि में हो रहा था। इसने हर मान को और हर वचन को निभाया, लेकिन कर्ण के सामने यह छोटा पड़ गया। जिस समय अर्जुन और कर्ण का युद्ध चल रहा था, उस समय कृष्ण ने कहा कि जीत के लिए सारे साम, दाम, दंड भेद और कूटनीति सबका इस्तेमाल कर दो , क्योंकि हार के बाद तुम्हें कोई नहीं पूछेगा। तुम इस धरती में मिट जाओगे। ठीक वहीं हुआ कर्ण के साथ, सत्य का वह पुजारी, कान्हा की आंखों और चातुर्यता की भेंट चढ़ गया, लेकिन वचन का तो वह भी पक्का था, तभी तो कान्हा ने भी उसकी देह को ऐसी जगह ले गए, जिस पर किसी और का वश नहीं चलता। उदंडता तो उस समय हो गई थी जब कान्हा ने अपने वचन से भी दगा कर दिया था, उन्होंने जो वचन दुर्योधन को दिया था, वह कर्ण के आगे टू ट गया, लेकिन कर्ण ने जो अपनी मां को वचन दिया था, उसने उसका पूरा मान रखा। वह चाहता तो उन चारों भाइयों को कब का मौत की नींद सुला सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसे तो केवल अर्जुन को मारना था, लेकिन अर्जुन के साथ तो चालबाज कन्हैया था, जिसने पूरे समय कर्ण से उसे दूर ही रखा। पहले उसका कवच-कुंडल हथियाया, फिर श्राप का कोप और बाद में धोखा...इसके बावजूद भी वह वीर कर्ण शूरवीर की तरह लड़ा। इस दौरान का वह प्रसंग भी तो हैरत करने वाला ही था, जब कर्ण बाण मारता तो अर्जुन का रथ 5 फीट पीछे जाता, और जब अर्जुन बाण मारता तो कर्ण का रथ 10 फीट पीछे चला जाता। इस पर कर्ण के बाण पर मुरली वाले कहते वाह कर्ण वाह...यह देखकर अर्जुन हैरत में पड़ जाता है और वह कहता है कि हे कान्हा आखिर मेरे बाण का असर तो ज्यादा दिखाई दे रहा है फिर कर्ण के बाण पर आप उसे वाह-वाह क्यों दे रहे हैं, तो कान्हा कहते हैं अर्जुन तेरे रथ पर तो मैं और हनुमान बैठे हैं, तब भी पांच फीट जा रहा है, उसके रथ पर तो कोई नहीं है। आखिरी में उसका रथ कीचड़ में फंस जाता है, उस समय कर्ण ने कहा था कि मैं निहत्था हूं और वीर निहत्थों पर वार नहीं करते, लेकिन कृष्ण ने उस समय अर्जुन को कहा कि इसे मत छोड़ो और वहीं पर उसका वध कर दिया गया। वह मर कर भी युद्धभूमि को अमर कर गया। ऐसा महान था कर्ण, जिसने कृष्ण के कद को छोटा बना दिया था। बात यहां कृष्ण को कम करने की नहीं है,बल्कि यह भी है कि युद्धभूमि में कोई किसी का रिश्तेदार नहीं होता है और यह जीवन एक कर्मयुद्ध है, अगर यहां सभी योद्धा हैं और जिस तरह एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती हैं, उसी प्रकार एक युद्ध में दो विरोधी वीर नहीं हो सकते , या तो उसे मरना होगा या इसे। भावनाओं के खेल वास्तविकता के धरातल पर चकनाचूर हो जाते हैं और सपने हकीकत तभी बनते हैं, जब उसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति और असीम त्याग करना पड़ता। अर्जुन कई बार दुर्बल हुआ, लेकिन उसके साथ वह कृष्ण था। आज भी हमारे पास कृष्ण के आदर्श हैं और उस तरह से जीवन को जीना चाहिए, क्योंकि मैनेजमेंट का जमाना है और अगर जीवन मैनेजमेंट आपने नहीं किया तो कुछ नहीं हो सकता है।

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