अपनत्व का भाव


आपकों  ढूँढता हूँ  हवा में जल में
चाँद की रौशनी में
आपकों ढूँढता हूँ और पुछता हूँ आपसे
की "कौन हो आप मेरे" आप खड़े सिर्फ हँसते रहते है  
रात-रानी और रजनीगंधा में
महसुस करता हूँ अभी-अभी उगी पत्तियों में
किताबों से पुछता हूँ आपके बारे में
फिर महसुस करता हूँ अपने अन्दर उन धमनियों और आत्मा में
फिर पुछता हूँ  "आपका कौन सा अंश है मेरे इस शरीर में"
फिर वह हँस देते है अपनत्व का भाव लिए
मै भी अपने पूर्वज का एक अंश हूँ
और पूर्वज अपने बच्चें को कभी हारते नहीं देख सकता
कभी रोते नहीं देख सकता
कभी रोते नहीं देख सकता..................|
                                                              



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