अपने विवेक की सुनिए


                                *******अपने विवेक की सुनिए****
क्या हर अच्छे या बुरे इंसान के शरीर में एक हीं प्रकार का विवेक होता है ? मैं कुछ और गहराई में गया, एक-एक रहस्य से पर्दा उठता चला गया..।
ईश्वर का अगर विवेक पर प्रभाव रहता तो यह संसार हीं नहीं होता, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क का वजूद हीं नहीं होता ।
अधर्म है तभी धर्म है, पाप है तभी पुण्य है, नर्क है तभी स्वर्ग है, अधर्म बिना धर्म का, पाप बिना पुण्य का, नर्क बिना स्वर्ग का कोई वजूद हो ही नहीं सकता ।
अगर सबकुछ ईश्वर के प्रभाव में होता तो इस संसार का कोई मतलब हीं नहीं था, सिर्फ धर्म, पुण्य, स्वर्ग होना असंभव है ।
इंसान को यह पता होना हीं चाहिए की धर्म क्या है, पुण्य क्या है, स्वर्ग क्या है ।
क्या हम अधर्म, पाप, नर्क के बिना धर्म, पुण्य, स्वर्ग को जान सकते हैं । कभी नहीं ।
ईश्वर ने सोचा शरीर तो कुछ है ही नहीं, आत्मा तो मेरा अंश होने के कारण पवित्र हीं रहेगी तो फिर अधर्म आएगा कहाँ से ?
ईश्वर को भी परेशानी जरुर हुई होगी, फिर ईश्वर ने सोचा होगा क्यों न इंसान के अंदर "विवेक" डाल दूँ , जिस पर मेरा प्रभाव न रहे, और इंसान अपने विवेक द्वारा कर्म करे, और उस कर्म का उत्तरदायी वह स्वयं हो और आत्मा के रूप में मेरा अंश उसे हर अच्छे-बुरे कर्म करने के पहले एक बार सलाह दे, अब उस इंसान के विवेक पर निर्भर है की वह शुभ कर्म करता है या अशुभ..।
कोई भी इंसान कोई भी अच्छे या बुरे कर्म करता है तो उसकी अंतर-आत्मा एक बार उसे सलाह अवश्य देती है, की यह कार्य करो या न करो, अगर हमारा मन कुछ गलत करने की सोचता है तो हमारे अंदर से एक बार आवाज आती है नहीं यह ठीक नहीं है, इसे मत करो । यह कौन कहता है ?
हमारा मन हमारे विवेक के अधीन है



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