कर्मभूमि

                            

                              
 अगर कृष्ण चाहते तो महाभारत का युद्ध कुछ पल में खत्म कर देते लेकिन वह कर्मभूमि और धर्मभूमि था वहा तो महारथी भीष्म,द्रोणाचार्य,अश्वत्थामा, दुर्योधन,शकुनि ,कर्ण इत्यादि यहाँ तो सब को अपना दाव आजमाना था हर कोई इस युद्ध को जितना चाहता था.लेकिन यह तो कर्मभूमि था जहां धर्म के रथ पे सवार भगवान कृष्ण सब को अपना-अपना दाव आजमाने देना चाहते थे देखना चाहते थे की इस कर्मभूमि में कौन - कौन अपना युद्ध कौशल दिखा सकते थे, कान्हा सब को बारी-बारी से परखना चाहते थे.और जब कर्ण इस युद्धभूमि में उतरे तो कान्हा अर्जुन को कर्ण से दूर ही रखें क्योकि वह जानते थे की अर्जुन को परास्त सिर्फ कर्ण ही कर सकते थे .लेकिन कर्ण सत्य का  पुजारी कान्हा ,की आंखों और चातुर्यता की भेंट चढ़ गया, इस दौरान का वह प्रसंग भी तो हैरत करने वाला ही था, जब कर्ण बाण मारता तो अर्जुन का रथ 5 फीट पीछे जाता, और जब अर्जुन बाण मारता तो कर्ण का रथ 10 फीट पीछे चला जाता. इस पर कर्ण के बाण पर कान्हा कहते “वाह कर्ण वाह...” यह देखकर अर्जुन हैरत में पड़ जाता है और वह कहता है कि हे कान्हा आखिर मेरे बाण का असर तो ज्यादा दिखाई दे रहा है फिर कर्ण के बाण पर आप उसे वाह-वाह क्यों दे रहे हैं’, तो कान्हा कहते हैं अर्जुन तेरे रथ पर तो मैं और हनुमान बैठे हैं, तब भी पांच फीट जा रहा है, उसके रथ पर तो कोई नहीं है यह सुन अर्जुन हैरान हो गया.आखिरी में उसका रथ कीचड़ में फंस जाता है, और अर्जुन वहीं पर उसका वध कर दिया वह युद्धभूमि में मर कर भी अमर हो गया.  
राम-रावण की लड़ाई में भी युद्धभूमि में भी जब राम ने रावण को मारा तो जब वह तड़प रहे  थे तभी राम लक्ष्मण के  पास गए और बोले जाओ और सफल राज-काज के गुर उनसे सिखों क्योकि रावण कोई मामूली योद्धा नहीं थे,क्योकि राम जानते थे कि रावण एक विद्वान और प्रतापी राजा थे इसलिए वह लक्ष्मण को कुछ सिखने के लिए वहा भेजें और तो लक्ष्मण  रावण के सर के पास खड़े हो गये किन्तु रावण ने कोई जवाब नहीं दिए फिर राम ने लक्ष्मण को सिख दिए की  “अगर किसी से कुछ सीखना हो तो उसके चरणों में रहकर सिखा जाता है” फिर लक्ष्मण ने  शिष्टाचार के साथ उनके चरण के पास खड़े हुए तब रावण उन्हें कई निति और नियमो की सिख दी |

आज भावनाओं के खेल वास्तविकता के धरातल पर चकनाचूर हो जाते हैं और सपने हकीकत तभी बनते हैं, जब उसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति और असीम त्याग करना पड़ता है आज भी यह एक कर्मभूमि है जहां मुझे विश्वास है की यहाँ भी जीत उसी की होगी जो कर्म करेगा निस्वार्थ भाव से. छल,कपट प्रतिस्पर्धा,इंटरनेट,फेसबुक ,व्हाट-आप के बिच हमारे ये बच्चें जो इन सब के बिच अपना भविष्य का निर्माण करेगा वही सबसे बड़ा योद्धा कहलायेगा.और इस कर्मभूमि में जीत भी उसी की होगी ये मेरा विश्वास है आज कल के बच्चें भी कुछ करना चाहते है एक परिवर्तन लाना चाहते है खुद में और इस समाज में.अब ये परिवर्तन हो के रहेगा.  
                                                                           
                                     

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